मन को यह आभास एकमात्र अज्ञान के कारण होता है । गलत ज्ञान होना ,यही समस्त दुखों का कारण है ।
कुमति कीन्हि सब विश्व दुःखारी ।
एकमात्र गलत मति के कारण , अज्ञान के कारण यह सम्पूर्ण चराचर दुःखी है ।
हमने या हमारे मन ने जिस में सुख दुख माना होता है , वही हमें सुख और दुख देता है ।
कुत्ते ने स्वर्ण में कोई सुख दुख नहीं माना है , आप उसको 1 टन सोना देकर देखिये , वह नहीं सुखी होगा ।
और एक टन सोना उससे छीन कर देखिये , तब भी वह नहीं दुखी होगा ।
क्योंकि उसके मन ने स्वर्ण में समान भाव रखा हुआ है । उसके लिए वह मिट्टी है ।
यह बात ध्यान रखिये , एक अपेल सिद्धांत :-
जिस वस्तु में जितनी मात्रा का सुख हमें मिलता है , या हमारे दिमाग मे सुख उसके प्रति बिठाया गया है , ठीक उतनी ही मात्रा का दुःख उससे हमें मिलता है ।
उस वस्तु के मिलन में जितनी मात्रा का सुख मिलेगा , उसी वस्तु के विछोह से या उसके अभाव से उतनी ही मात्रा का दुःख हमें मिलेगा ।
यह सुख दुख केवल मन द्वारा बनाया गया है ।
और बचपन से ही हमें हमारा परिवार, हमारा समाज , हमारी शिक्षा बस रात दिन पल पल हमें विभिन्न वस्तुओं में सुख दुख समझाने के लिए पल पल प्रयत्नशील हैं ।
तो यह सब मन द्वारा बनाया गया है ।
चित्तमेव हि संसारः l l
मनमेव हि संसारः ।।